Monday, July 19, 2010

सट के एक ख़याल जुडा रहा फिर भी आँखें ना हैरान हुई
बस तू ही तो बसा था रग रग में
तेरे कारण ही तो मैं खुद से लडती रही
कई बरस निकल गए मैं खिड़की से राहें तकती रही

तडके उठ रंगों से सजती रही
पल्लू में गांठें बांधती रही
कोई तो तरकीब लगानी ही थी
बस मैं समा बांधती रही
बस एक मुलाक़ात के पीछे मैं साँसें इकट्ठा करती रही
कई बरस निकल गए मैं खिड़की से राहें तकती रही

चौबारे पे जब भी शोर उठता .
धडकनें भी उनमे खो जाती
बुलावा समझ, दिल जश्न मनाता
हर पल मेरी रूह तुझसे जुडती रही
पी तेरे एक एहसास के पीछे बाहें मेरी सिमटती रही
कई बरस निकल गए मैं खिड़की से राहें तकती रही

आईने का मौन व्रत सैयां
ना सुझाए ना बोले तुझसी बतियां
चुप्पनचुपाई के खेल मैं तेरी उड़ीक की शमा जलाती रही
यूँ तो पी, उमर भर कोस्ती रही
कौन सा बेवक़्त सा वो पल जब तू सिर्फ़ मेरा…
ऐसा मैं समझती रही
लाख ठोकर मारी तुने फिर भी मन्नत सजाती रही ..

मुड के देखा तो, कमरे में लोह थी..
जो खिड़की पे मुझे बुलाती रही...

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